Suwarn Prashan(स्वर्ण प्राशन)

250.00

SKU: 01 Category:

सुवर्णप्राशन संस्कार – एक भारतीय परंपरा 

 

सुवर्ण हमारे शरीर के लिये श्रेष्ठत्तम धातु है। वह ना ही केवल बालको के लिये है, पर वह सभी उम्र के लिये उतनी ही असरकारक और रोगप्रतिकार क्षमता बढानेवाली है। ईसीलिये तो हमारे जीवन व्यवहार में सदीयों से सुवर्ण का महत्व रहा है। उसकी हमारे शारीरिक और मानसिक विकार में महत्वपूर्ण प्रभाव होने के कारण ही उसको शुभ मान जाता है, उसका दान श्रेष्ठ माना गया है । हमारे पूर्वजो की स्पष्ट समझ थी कि सोना हमारे शरीरमें कैसे भी जाना चाहिये ! ईसलिये ही हमारे यहाँ शुद्ध सोने के गहने पहनने का व्यवहार है; कभी नकली गहने पहनने पर बुजुर्गो की डाँट भी पडती है। यही कारण से ही हमारे राजा और नगरपति धनवान लोग सोने की थाली में ही खाना खाते थे, जिससे सुवर्ण घिसाता हुआ हमारे शरीर के भीतर जाये। सोने के गह्ने पहनना, सोना खरीदना, सोने का दान करना, सोने का संग्रह करना, सोनेकी थाली में खाना यह सभी बातों में हमारे आचार्यो का अति महत्वपूर्ण द्रष्टिकोण रहा था कि, सोना शरीरमें रोगप्रतिकार क्षमता तो बढाता ही है, और उसके साथ-साथ हमारी मानसिक और बौद्धिक क्षमता भी बढाता है। यह शरीर, मन एवं बुद्धि का रक्षण करनेवाली अति तेजपूर्ण धातु है। 

 

सुवर्णप्राशन से क्या फायदा ? 

 

आयुर्वेद के बालरोग के ग्रंथ काश्यप संहिता के पुरस्कर्ता महर्षि कश्यप सुवर्णप्राशन के गुणों का निम्न रूप से निरूपण किया है.

सुवर्णप्राशन हि एतत मेधाग्निबलवर्धनम् ।आयुष्यं मंगलमं पुण्यं वृष्यं ग्रहापहम् ॥मासात् परममेधावी क्याधिभिर्न च धृष्यते ।षडभिर्मासै: श्रुतधर: सुवर्णप्राशनाद् भवेत् ॥सूत्रस्थानम्, काश्यपसंहिता

अर्थात्

सुवर्णप्राशन मेधा (बुद्धि), अग्नि ( पाचन अग्नि) और बल बढानेवाला है। यह आयुष्यप्रद, कल्याणकारक, पुण्यकारक, वृष्य, वर्ण्य (शरीर के वर्णको तेजस्वी बनाने वाला) और ग्रहपीडा को दूर करनेवाला है.।

सुवर्णप्राशन के नित्य सेवन से बालक एक मास मं मेधायुक्त बनता है और बालक की भिन्न भिन्न रोगो से रक्षा होती है। वह छह मास में श्रुतधर (सुना हुआ सब याद रखनेवाला) बनता है, अर्थात उसकी स्मरणशक्त्ति अतिशय बढती है।यह सुवर्णप्राशन पुष्यनक्षत्र में ही उत्तम प्रकार की औषधो के चयन से ही बनता है। पुष्यनक्षत्रमें सुवर्ण और औषध पर नक्षत्र का एक विशेष प्रभाव रहता है। यह सुवर्णप्राशन से रोगप्रतिकार क्षमता बढने के कारण उसको वायरल और बेक्टेरियल इंफेक्शन से बचाया जा सकता है। यह स्मरण शक्ति बढाने के साथ साथ बालक की पाचन शक्ति भी बढाता है जिसके कारण बालक पुष्ट और बलवान बनता है। यह शरीर के वर्ण को निखारता भी है। ईसलिये अगर किसी बालक को जन्म से 16 साल की आयु तक सुवर्णप्राशन देते है तो वह उत्तम मेधायुक्त बनता है।और कोई भी बिमारी उसे जल्दी छू नही सकती |

 

 

Call Now Button